Khesari Lal Yadav Biography in Hindi |

बिहार के छपरा ज़िले की एक साधारण-सी बस्ती में, 15 मार्च 1986 को, एक ऐसे बालक ने जन्म लिया, जिसके भविष्य में मंच की रोशनी तो लिखी थी, पर रास्ता अंधेरे और काँटों से भरा हुआ था। किसान परिवार में जन्मा यह बच्चा बहुत जल्दी समझ गया था कि जीवन उसके लिए आसान नहीं होने वाला। घर में सीमित साधन थे, कभी भोजन पूरा नहीं होता, कभी पढ़ाई बीच में छूटने लगती। अभाव उसके बचपन का स्थायी साथी बन गया।

लेकिन उसी अभाव के बीच उसके भीतर एक स्वर पल रहा था। लोकगीतों का स्वर। खेतों में काम करते हुए, गलियों में खेलते हुए, वह गुनगुनाया करता। शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि यही स्वर एक दिन उसकी पहचान बनेगा।

जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही उसने गाँव छोड़ने का निर्णय लिया। रोज़गार की तलाश उसे दिल्ली ले गई। दिल्ली उसके लिए सपनों का शहर नहीं, बल्कि संघर्ष का शहर साबित हुई। वहाँ उसने वह सब किया जो कोई भी मजबूर इंसान करता है। कभी लिट्टी-चोखा बेचा, कभी मजदूरी की, कभी ढाबों में बर्तन धोए। छोटे से कमरे में कई लोगों के साथ रहना, दिन भर की थकान और रात को खाली पेट सो जाना — यह सब उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन गई।

लेकिन इन तमाम कठिनाइयों के बीच भी एक चीज़ नहीं बदली — उसका अभ्यास। काम से लौटकर थका शरीर जब चारपाई पर गिरता, तब भी वह सुर साधता। कभी खुद से, कभी दीवारों से, कभी अँधेरे से बात करता। उसे भरोसा था कि यह आवाज़ एक दिन उसे इस अंधेरे से बाहर निकालेगी।

साल 2008 में पहली बार किस्मत ने उसकी ओर थोड़ा सा मुस्कुराया। उसका लोकगीत एलबम “माल भेटाई मेला” रिलीज़ हुआ। यह गीत गाँव-गाँव, मेले-मेले गूंजने लगा। लोग पूछने लगे कि यह गायक कौन है। पहली बार उसका नाम भीड़ में खोने के बजाय पहचाना जाने लगा। यह कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं थी, लेकिन उसने उसे आत्मविश्वास दे दिया — और यही आत्मविश्वास उसके आगे के रास्ते का ईंधन बना।

गायन से मिली पहचान उसे फिल्मों की दुनिया तक ले आई। लेकिन सिनेमा की दुनिया उतनी ही कठोर थी जितनी चमकदार। शुरुआती फिल्में असफल रहीं। छोटे रोल मिले, कई बार नज़रअंदाज़ किया गया। कुछ लोगों ने साफ़ कह दिया कि वह हीरो बनने के लायक नहीं है। यह वाक्य उसके भीतर बहुत गहराई तक चुभ गया, लेकिन उसने इसे हार का नहीं, जिद का कारण बना लिया।

वह हर असफलता के बाद और ज़्यादा मेहनत करने लगा। अभिनय में सुधार किया, नृत्य सीखा, आवाज़ पर और काम किया। उसे पता था कि अगर रास्ता नहीं मिलेगा, तो उसे रास्ता खुद बनाना होगा।

फिर साल 2011 आया। फिल्म “साजन चले ससुराल” रिलीज़ हुई। यह फिल्म सिर्फ हिट नहीं हुई, इसने उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी। वह कलाकार, जिसे कल तक कोई गंभीरता से नहीं लेता था, अचानक भोजपुरी सिनेमा का मुख्य नायक बन गया। रातों-रात उसका नाम हर तरफ फैल गया।

इसके बाद उसका सफर तेज़ हो गया। फिल्में लगातार सफल होने लगीं, गानों ने यूट्यूब पर रिकॉर्ड तोड़े, मंच पर लाखों की भीड़ जुटने लगी। जो कभी दिल्ली की गलियों में संघर्ष कर रहा था, आज वही कलाकार सबसे ज्यादा मांग में रहने लगा।

लेकिन सफलता के इस शिखर पर पहुँचकर भी उसने अपने अतीत को कभी नहीं भुलाया। वह आज भी अपने संघर्ष के दिनों को याद करता है और अक्सर कहता है कि अगर उसने गरीबी और अपमान न देखा होता, तो शायद मेहनत का असली अर्थ कभी न समझ पाता।

खेसारी लाल यादव की कहानी सिर्फ एक अभिनेता या गायक की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है, जिसने हालात के सामने घुटने नहीं टेके, जिसने भूख, अपमान और असफलता को अपना गुरु बनाया और साबित किया कि अगर सपना सच्चा हो और हौसला ज़िंदा हो, तो मिट्टी से मंच तक पहुँचना संभव है।

यह जीवनी दरअसल हर उस व्यक्ति की कहानी है, जो अँधेरे में खड़े होकर रोशनी का सपना देखता है।

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