महाभारत को घर घर तक पंहुचाने वाले सख्श Dr Rahi Masoom Raza Biography in Hindi

dr rahi masoom raza biography in hindi

Dr. Rahi Masoom Raza Biography in Hindi


हम धारवाहिक की बात करते हैं फिल्मो की बात करते हैं कलाकार की बात करते हैं। लेकिन इन सब को सफल बनाने के लिए इन सब के पीछे बहुत लोगों की मेहनत होती है। जिन्हे हमेसा से नजरअंदाज किया जाता रहा है। इन्ही में से एक वर्ग है लेखकों का जो दमदार पटकथा और डायलॉग लिखकर कलाकारों, धारावाहिकों और फिल्मो को पहचान दिलाते हैं। अभिनेता या अभिनेत्री के प्रसिद्धि की अगर कोई पहली सीढ़ी है तो वो है पटकथा और उनके डॉयलोग्स। और यही प्रसिद्धि दिलाने का काम एक लेखक की कलम करती है। इन्ही लेखकों में से एक सुप्रसिद्ध लेखक हैं डॉक्टर राही मासूम रजा। जिन्होंने महाभारत धारावाहिक के डायलॉग्स लिखकर इस धारावाहिक को उस ऊंचाई में पहुंचाया जहाँ पहुंचना किसी भी धारावाहिक के लिए आसान नहीं है। राही साहब के जीवन के बारे में जानेंगे लेकिन उस से पहले आप से निवेदन है चैनल को अगर अब तक भी सब्सक्राइब नहीं किया है तो कर लें एक यही चीज है जो हमें और वीडियो बनाने में मदद करती है। कमेंट करके जरूर बताएं आपको वीडियो कैसा लगा और पसंद आये तो लाइक भी कर दें। 

डॉ. राही मासूम रज़ा का जन्म 1 सितम्बर 1925 में गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन से ही उन्हें मीठा खाने के शौक था। 11 साल की उम्र में उन्हें टीबी हो गई। उस ज़माने में टीबी का कोई इलाज नहीं था। बचपन में पोलियो की बीमारी के कारण उन्हें पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी, लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने फिर से पढ़ना शुरू किया और इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही साहब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। परिस्थितिवश उन्हें अध्यापन कार्य छोड़ना पड़ा और वे रोज़ी-रोटी की तलाश में मुंबई पहुंच गये।

राही साहब 1967 के आरंभ में बंबई चले आए। उन्हें बंबई में ख़ासा 'स्ट्रगल' करना पड़ा। वहाँ दो साहित्यकारों ने उनकी बहुत मदद की। एक थे 'धर्मयुग' के संपादक धर्मवीर भारती और दूसरे 'सारिका' के संपादक कमलेश्वर। इन लोगों ने ही उन्हें फ़िल्मों के कई निर्माता और निर्देशकों से 'इंट्रोड्यूज' भी कराया। बाद में उनकी बीआर चोपड़ा और राज खोसला जैसे फ़िल्मकारों से दोस्ती हो गई और वो उनसे फ़िल्में लिखवाने लगे। कुछ ही दिनों में राही साहब की गिनती बंबई के चोटी के पटकथा लेखकों में होने लगी। 


राही का रुझान शुरू में शायरी की तरफ़ अधिक था। उनकी शायरी में उनके अपने लहजे की खनक थी। कामयाबी के बावजूद राही ने यकायक शायरी छोड़ दी और नॉवेल की तरफ रूख किया। उन्होंने हिंदी में कई नॉवेल लिखे जिसमें सबसे मशहूर था 'आधा गाँव'। राही मासूम रज़ा के बारे में मशहूर था कि वो एक साथ कई स्क्रिप्ट्स पर काम करते थे। शुरू-शुरू में वो नाम बदल कर भी उपन्यास लिखा करते थे। इसी दौरान इनकी मुलाक़ात नय्यरा से हुई जिनसे उन्होंने शादी की। कमाल की बात थी कि उन्होंने कभी होटल जा कर नहीं लिखा। दूसरे लेखकों के लिए हमेशा लिखने के लिए होटल का कमरा बुक कराया जाता था और शराब वगैरह का इंतेज़ाम रहता था। लेकिन उन्होंने हमेशा अपने घर में ही लिखा। वो हमेशा ख़िमाम का पान खाते थे। वो चेन-स्मोकर थे। उनके हाथ में हमेशा 'रेड मार्लबोरो' सिगरेट होती थी। उनके सामने हमेशा चांदी का एक पानदान होता था। वो हॉल में तकिए पर लेट कर लिखते थे और एक साथ चार-पांच स्क्रिप्ट्स पर काम किया करते थे। लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। घर में कव्वालियाँ चलती रहती थीं। लेकिन इससे राही साहब का ध्यान कभी भंग नहीं होता था। 
यहीं रहते हुए राही साहब ने आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 जो बाद में हिन्दी भासा में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिख चुके थे। मुम्बई रहकर उन्होंने 300 फ़िल्मों की पटकथा और संवाद लिखे तथा दूरदर्शन के लिए 100 से अधिक धारावाहिक लिखे, जिनमें नीम का पेड़ , मैं तुलसी तेरे आँगन की , डिस्को डांसर, महाभारत , गोलमाल, क़र्ज़,  जुदाई, हम पांच, परंपरा  अविस्मरणीय हैं। 

महाभारत धारावाहिक भारत के सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में से एक बन गया है। भारत के लोगों ने महाभारत की कहानी सुनी ज़रूर थी, लेकिन राही मासूम रज़ा ने उसे हर घर में पहुंचा दिया। शुरू में जब बीआर चोपड़ा ने उन्हें महाभारत लिखने का प्रस्ताव दिया तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया। लेकिन बात किसी तरह समाचार पत्रों में छप गई। जब बीआर चोपड़ा ने घोषणा की कि राही मासूम रज़ा महाभारत के संवाद लिखेंगे, तो उनके पास पत्रों की झड़ी लग गई, जिनका लब्बोलबाब था कि सारे हिंदू मर गए हैं जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवा रहे हैं। चोपड़ा साहब ने सभी पत्र राही साहब के पास भेज दिए। राही की ये कमज़ोर नस थी। वो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े अध्येता थे। अगले दिन उन्होंने चोपड़ा साहब को फ़ोन किया, 'चोपड़ा साहब! महाभारत अब मैं ही लिखूंगा. मैं गंगा का बेटा हूँ। मुझसे ज़्यादा हिंदुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को कौन जानता है? और इस प्रकार से उन्होंने महाभारत की पटकथा लिखने के लिए हामी भरी। 

राही का धर्म को संकीर्ण ढंग से देखने वालों से हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा। राही ने मुंबई में फ़िल्म लेखन की सारी बुलंदियों को छुआ, लेकिन बहुत अधिक पैसा नहीं कमा पाए। उन्हें  पैसा मांगना नहीं आया। फ़िल्म इंस्टिट्यूट का कोई बंदा उनसे फ़िल्म लिखवाने जाता था तो वो उससे कोई पैसा नहीं लेते थे, क्योंकि वो मानते थे की वो भी उसी इंस्टिट्यूट से पढ़े हैं।

आधा गाँव' के माध्यम से राही साहब ने उस मुस्लिम दृष्टिकोण और मुस्लिम राष्ट्रीयता को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जो न सिर्फ़ भारतीय होने की अधिकारी है, बल्कि उसके साथ किसा धर्म को जोड़ना शायद उचित नहीं है राही मासूम रज़ा कट्टरता के सख़्त विरोधी रचनाकार तो थे ही लेकिन उनका विरोध अपने अंदर एक मूल्यवान सांस्कृतिक पहचान को समेटे हुए था। वे जानते थे कि सामाजिक कुरीतियों का निवारण हमारी अपनी संस्कृति से ही निकल कर आएगी। इसीलिए न उनसे तुलसी छूट पाए और न कालिदास और इसीलिए वे कालिदास के मेघदूत से महादेव को संदेश पहुँचाने की बात करते थे। जीवन में संघर्ष को उन्होंने बहुत ही कम उम्र में अनुभव किया था। ज़िदगी को आज़माना जैसे रज़ा साहब के बचपने का खेल सा हो गया। इसी तरह वे अपने नज़्मों में भी संघर्ष को बड़े आशिकाना ढंग से पेश करते रहे।

डॉ राही मासूम रज़ा का निधन 15 मार्च, 1992 को मुंबई में हुआ। राही साहब जैसे लेखक कभी भुलाये नहीं जा सकते। उनकी रचनायें हमारी उस गंगा-यमुना संस्कृति की प्रतीक हैं जो वास्तविक हिन्दुस्तान की परिचायक है।    

 
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